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बिन नाविक की नाव

Prakriti

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कुछ समझ नहीं आता
        
                                                    
                            
आंखों के आगे अंधेरा है जाता।

ना जाने क्या से क्या हो गया
मुड़कर देखूं एक नादान सा
चेहरा नजर आया

एक मासूम सा बचपन नजर
आया।

एक नाव मे बैठा बिना मांझी का
बचपन तैरता रहा बिना किसी
सहारे कभी कहीं टकराता तो
कहीं चला जाता।

बस चलता जाता चलता जाता।
आंधी तो तुफान आए सब सह
जाता फिर चलता रहता।

ना जाने किस भरोसे चल रही थी
नाव कुछ समझ नहीं आता।

एक किनारे पर पहुंचकर सुरक्षित
फिर देखा की यह तो ऊपरवाले
के सहारे चल रही थी।
एक महीने पहले
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