कुछ समझ नहीं आता
आंखों के आगे अंधेरा है जाता।
ना जाने क्या से क्या हो गया
मुड़कर देखूं एक नादान सा
चेहरा नजर आया
एक मासूम सा बचपन नजर
आया।
एक नाव मे बैठा बिना मांझी का
बचपन तैरता रहा बिना किसी
सहारे कभी कहीं टकराता तो
कहीं चला जाता।
बस चलता जाता चलता जाता।
आंधी तो तुफान आए सब सह
जाता फिर चलता रहता।
ना जाने किस भरोसे चल रही थी
नाव कुछ समझ नहीं आता।
एक किनारे पर पहुंचकर सुरक्षित
फिर देखा की यह तो ऊपरवाले
के सहारे चल रही थी।