ज़माना नया है मगर दिल वही कहानी सुनते हैं,
नए दौर के गुमसुम लोग ग़ज़लें पुरानी सुनते हैं।
यहाँ हर शख़्स जल्दी में है ख़ुद तक लौट आने की,
मगर कुछ लोग ठहरकर ख़ुद की कहानी सुनते हैं।
न जाने कौन-सा रिश्ता है इन ख़ामोश रातों से,
जो सोते नहीं, बस चाँद की निगरानी सुनते हैं।
जहाँ हर बात अब दो लफ़ज़ों में ख़त्म होती हैं,
वहीं लोग मेरी चुप्पी से पूरी कहानी सुनते हैं।
हर इक फ़ैसला दुनिया की नज़र से तोलते हैं,
मगर दिल की अदालत में अपनी मनमानी सुनते हैं।
- प्रखर कुमार सागर