सुख जीवन में भले मत देना,
दुख ही दुख का अम्बार रहे।
जब-जब मैं गिरु फिर धारणी पर
गिरधर तू मेरे साथ रहे।।
मीरा से लेकर कुंती तक,
राधा से लेकर शबरी तक।
जो बिंधा कष्ट के दल-दल में,
कान्हा तू उससे प्रेम करे।
गिरधर तू उसके साथ रहे।।
राणा ने विष न दिया होता,
और मीरा ने न पिया होता।
तो प्रेम तेरा क्या मिल पाता?
कोई समझाकर इतना तो कहे
गिरधर तू मेरे साथ रहे।
बिन ब्याही मां को कौन सहे?
परिवार के संग वन - वन में रहे।
कुंती ने अनंत कष्ट पाया
तब ही तो तुमने अपनाया।
कान्हा का प्रेम तब ही पाया।
राधा तो प्रेम की देवी हैं।
पर विरह वेदना उन्हें भी है।।
रख अपने वियोग को हृदय में,..
सृष्टि को प्रेम सिखलाया।
अरे! तभी तो राधा ने मोहन को पाया।
न मुझसे प्रेम हो किसी को,
न कोई मेरा अपना हो....
जब अकेला मुझको पाओगे,
तब ही तो तुम अपनाओगे।
मेरे पास चले आओगे।
गिरिधर मेरे होजाओगे।।