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सब्रो ओ सुकून लूट के बाहें मरोड़ के

Pradeep Tiwari'Deep'

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            सब्र ओ सुकून लूट के बाहें मरोड़ के।
        
                                                    
                            
वो जा रहा ग़ुलाब से ख़ुशबू निचोड़ के ।।

बे-फ़ैज़ बेरहम भी है वो संग दिल सनम ।
मतलब निकल गया तो चला दिल को तोड़ के।।

साकी तलब ये इश्क़ की बरसों बरस की है।
मन की बुझा दे प्यास न जा बज़्म छोड़ के।।

आब ए हयात दे मुझे प्यासा है दिल मेरा।
ऐ हुस्न ना जा इश्क़ के पन्ने को मोड़ के।।

सीने से लग के दिल की मेरे जिल्द साज़ी कर।
बिखरी हुई किताब के पन्नों को जोड़ के।।

माना के ख़ाली जेब है और खंडहर मकान।
गुलशन करेंगे सब्ज़ ये कुछ जोड़-तोड़ के।।

हासिल करेगा 'दीप' तुझे उस जहान से।
जन्नत के सब फरिश्तों को भी तोड़-फोड़ के।।
-प्रदीप तिवारी 'दीप'
3 महीने पहले
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