हाय दिलवर ने हया का रूख़ पे आँचल कर दिया
चाँद बदली में छुपा और हमको पागल कर दिया
मस्तियों विच पंछियों ने चाल अविरल कर दिया
वुसअत ए परवाज़ ने तब पल में नभ-तल कर दिया
दस्त-बस्ता हम खड़े थे आप के दीदार को
उफ़ नज़र के तीर ने इस दिल को घायल कर दिया
काट कर जंगल इमारत हर तरफ़ कर दी खड़ी
ताक़त-ए-परवाज़ ने इन्सां को छल-बल कर दिया
टूट कर अपने दरख़्तों से गिरी जब पत्तियांँ
बाइस-ए-शोहरत गई तो नैन जल-थल कर दिया
वक़्त-ए-फुर्सत रात दिन होते रहे शिकवे गिले
वक़्त-ए-रुख़्सत अश्क़ ने फिर दिल को निर्मल कर दिया
कौन कहता है मुझे पागल बता ऐ आइना
धो के मैंने मैल इस तन मन को उज्जल कर दिया
'दीप' दिल के इस गुलिस्तांँ में खिली रंग-ए-हिना
रुत बसंती ने जमीं को फिर से मख़मल कर दिया
-प्रदीप तिवारी 'दीप'