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सुरों के पंछी

Pradeep Mukherjee

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            सरगम के तारों में
        
                                                    
                            
बंधा राग
सीख कर उस्तादों से
और करअभ्यास अपना निरंतर
छोड़ता है जब कोई फनकार
सुरों के पंछी
तो उनकी मीठी तान
घोलती श्रोताओं कानों में
रस की मिठास
भरती उनके दिलों में
एक अद्भुत सुकून
जिससे बेसाख्ता कर उठते
वे वाह, वाह
बजती फिर ज़ोर-ज़ोर से तालियां
फनकार की सुरों की
अदायगी की
सराहना में
गूंजता है स्वर फ़िज़ां में
'वन्स मोर-वन्स मोर' का
सचमुच,बंधता क्या समां
चारों ओर।
एक दिन पहले
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