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पैदा होता है आदमी

Pradeep Mukherjee

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            सारा खेल ख़त्म हुआ
        
                                                    
                            
मिनटों में पंछी पिंजरे से मुक्त हुआ
हाय , यह क्या हुआ !
रह गए सारे अरमान धरे के धरे
जोड़-तोड़ कर जो बनाया था
वह भवन रह गया बस खड़ा
उसको खड़ा करने के पीछे की
तपस्या और बलिदान
सब मिल गए मिट्टी में
आदमी स्वयं भी हवाले हुआ मिट्टी के
जब सब कुछ है मिट्टी
तो मिट्टी से सोना निकलने की यह कवायद
जाने चली आ रही है कब से
आदमी सोचता कुछ है और होता कुछ है
कर्मयोग ठीक काम करता है
पर भाग्य का योग या जोड़-तोड़ भी
अपना काम करता है
इसलिए ठीक नहीं
ज्यादा महत्वकांक्षाएं पालना भी
सही तरह से निर्वाह हो जाए
और मन में रहे बनी
सुख-शांति भी
यही सही है जीने के लिए
वरना अमृत भला ज़िंदगी में
हुआ है किसे नसीब
पैदा होता है आदमी
गरल पीने के लिए।


हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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