है इस कलियुग का
यह कैसा चलन और विधान
'कि पति-पत्नी के रिश्ते में
होनी तो चाहिए समानता
लेकिन व्यावहारिकता में
पड़ती नहीं दिखाई
कहीं यह समानता
पति को तो सास-ससुर को अपने
पड़ता है देना अति गहरा मान
और दर्ज़ा देवी-देवता का
लेकिन जब आती है बारी
उसके अपने माता-पिता की
तो पड़ता है सहना उन्हें
कदम-कदन पर
उसकी पत्नी द्वारा दिया
उलाहना और उसके द्वारा किया
उपहास और अपमान
अतः हर हाल में है परचम ऊंचा
पत्नी का ही
फिर भी है इलज़ाम
बेचारे पति पर
अंन्यायी उसके होने का /