पता नहीं कब
गुज़र गया दिन
और हो गई
जीवन की शाम
हो गई मेहनत-मशक्कत
बहुत
बदल गया पानी में
खून बहुत
मन-अभिमान की
खींचातानी भी
हुई बहुत
लेकिन अब सब है बेमानी
जीवन है बस आनी-जानी
यहां तो हैं बस मुसाफिर
हम सब
न जाने ढल जाएगी
जीवन की शाम भी
कब।