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छोड़ देना चाहिए अपना व्यक्तिगत अभिमान

Pradeep Mukherjee

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            आजकल जिसे देखिए
        
                                                    
                            
रहता है वही
अपने आप को
सर्वोच्च मानने की
खुशफहमी में
यहां तक कि
मानते हुए अपने आपको
संपूर्ण निर्दोष
ढूंढ़ने लगता है वह दोष
औरों में
यही सोच है इस युग में
एक व्यापक और भयानक
रुग्णता
असल में,
अपने मन के दरवाज़े हमें
रखने चाहिएं
हमेशा खुले
ताकि कर सके भेद मन
सही और गलत के बीच
स्वयं को हमेशा दोषमुक्त
और दूसरों को दोषी
मान लेना
है नहीं कोई
अक्लमंदी की बात
इसलिए है ज़रूरत
आत्म-विश्लेषण की
संभव है जो
मन के दरवाज़े
खुले रखकर ही
ताकि कर सके मन
सही और गलत की पहचान
इसमें छोड़ देना चाहिए
अपना व्यक्तिगत अभिमान।
एक महीने पहले
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