आजकल जिसे देखिए
रहता है वही
अपने आप को
सर्वोच्च मानने की
खुशफहमी में
यहां तक कि
मानते हुए अपने आपको
संपूर्ण निर्दोष
ढूंढ़ने लगता है वह दोष
औरों में
यही सोच है इस युग में
एक व्यापक और भयानक
रुग्णता
असल में,
अपने मन के दरवाज़े हमें
रखने चाहिएं
हमेशा खुले
ताकि कर सके भेद मन
सही और गलत के बीच
स्वयं को हमेशा दोषमुक्त
और दूसरों को दोषी
मान लेना
है नहीं कोई
अक्लमंदी की बात
इसलिए है ज़रूरत
आत्म-विश्लेषण की
संभव है जो
मन के दरवाज़े
खुले रखकर ही
ताकि कर सके मन
सही और गलत की पहचान
इसमें छोड़ देना चाहिए
अपना व्यक्तिगत अभिमान।