वे कहते हैं—
"सब ठीक है।"
और उसी वक़्त
किसी माँ की गोद से न्याय छीन लिया जाता है।
कहीं एक कथित मुठभेड़ सवालों से पहले ही फैसला लिख देती है,
कहीं उबलता हुआ पानी किसी स्त्री के शरीर पर नहीं,
समाज की आत्मा पर फेंका जाता है।
तेरह बरस की बच्ची
जिसे किताबों और सपनों के बीच होना चाहिए था,
वह दरिंदगी के आँकड़ों में बदल दी जाती है।
एक ओर परीक्षाओं को "योग्यता का पर्व" कहा जाता है,
दूसरी ओर पेपर बिकते हैं,
भविष्य लीक होता है,
और मेहनत की स्याही भ्रष्टाचार के पानी में बहा दी जाती है।
किसी छात्रा की मौत पर
मोमबत्तियाँ जलती हैं,
हैशटैग चलते हैं,
फिर शहर अपनी सामान्य गति में लौट जाता है—
जैसे इंसान नहीं, समाचार मरा हो।
ईंधन में मिलावट से लेकर
व्यवस्था की नीयत तक,
हर जगह एक ही फ़ॉर्मूला है—
पहले प्रयोग जनता पर,
फिर लाभ सत्ता पर।
यह कैसा देश बना रहे हो तुम,
जहाँ अपराध से ज़्यादा
उसकी ख़बर की उम्र छोटी है?
जहाँ संविधान की प्रस्तावना
दीवार पर टंगी रहती है,
और न्याय
फ़ाइलों में दम तोड़ता है।
हम चुप रहे
तो अगली ख़बर किसी और की नहीं,
हमारी होगी।
इसलिए लिखो।
बोलो।
पूछो।
याद रखो कि लोकतंत्र की सबसे बड़ी साँस
प्रश्न है,
और सबसे बड़ी मौत
डर।
प्रतिरोध किसी सरकार के विरुद्ध नहीं,
अन्याय के विरुद्ध होना चाहिए।
क्योंकि सत्ता बदलती रहती है,
लेकिन अगर नागरिक की चुप्पी स्थायी हो जाए,
तो अत्याचार का शासन कभी समाप्त नहीं होता।