क्यूं इस नतीजें पर कई रिश्ते आ जाते हैं
सामने हो कर भी यूं मुंह मोड़कर जाते हैं
क्या ऐसी नफरत है जो अपनों से बड़ी होती है
सच झूठ का पता नहीं पर मौत को उकसाती हैं
ना है इस में चैन ना हैं इसमें सुकून
क्यूं नफ़रत को लोग समझते हैं अपना जुनून
कितने जल गए कितने जल रहे हैं इसकी आग में
हाथ ना आया कुछ भी रिश्तों की इस जंग में