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अकेला हूँ

Poonam milap bansal

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अकेला हूँ अकेला रहने दो
        
                                                    
                            
ख़ुद से ख़ुद की बात कर लेने दो…

दौड़ता रहा उम्र भर, ना ख़त्म होने वाली भीड़ में
ताउम्र जागा, ना सोया एक भी पहर में

खुशियों के ताने-वाने बुनता रहा…उम्र भर,
क्या पता हुई है या नहीं कभी उसकी कद्र,

बचपन खेल भर खोया ऐसा तो नहीं है
मैंने ख़ुद से पहले दूसरों की सुनी है

जवानी की दौड़ में भागता चला गया
जिम्मेदारियों को घर की समेटता चला गया

कभी भाई, कभी पिता कभी पति बन जिया हूँ मैं
सबकी हर ख्वाहिशों को ख़ुद में सिया हूँ मैं

पर अब ना ये ख़बर है,कि जी भर जी लिया हूँ मैं
पता नहीं क्या है वो जो कहीं छोड़ दिया हूँ…मैं

ढूँढते हुए उस कमी को अब एक अरसा हुआ
चंचल सा नौजवान, ना जाने कब बूढ़ा हुआ

एक दिन ये दौड़ यही ख़त्म हो जानी है
एक पंक्ति- भर की बस मेरी ये कहानी है…

अब लगता है जी लूँ जी भर
जवानी फिर से पा लूँ मैं,
फिर लौट जाऊ वहाँ,
कुछ पल ख़ुद के लिए निकालूँ मैं…

पर समय का पहिया कहाँ कभी रुक पाया है
रेत पे लिखा वक़्त कोई नहीं मोड़ पाया है

उड़ जाएगा पंछी एक दिन
कहकर, ये जग एक मेला है
यहाँ आने बाला हर शख़्स
ख़ुद से ही अकेला है

तोले भर की मिट्टी से बनी हुई ये काया है
जो है कर्म है ख़ुद के बाक़ी सब मोह- माया है
बाक़ी सब मोह-माया है
2 महीने पहले
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