विज्ञापन

प्लास्टिक के छाते और बंजर मन

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हम जो जल-संकट पर वेबिनार करते हैं वातानुकूलित कमरों में,
        
                                                    
                            
बारिश आते ही सबसे पहले प्लास्टिक के छाते तान लेते हैं।
बूंदों के स्पर्श से डरने वाला यह कैसा सभ्य समाज है?
जो पानी से अपनी ही मिट्टी का रिश्ता नहीं पहचानता।
हम नदियों को बांधते रहे, तालाबों को मलबे से पाटते रहे,
और अब जब बाढ़ आती है,
तो कुदरत को 'क्रूर' और खुद को 'बेचारा' मान लेते हैं।

इस सावन, जब बिजली कौंधे तो समझना
यह उसका गुस्सा है, जो तुमसे तुम्हारा सच पूछ रहा है।
सृजन की जिस कोख (नारी) को तुमने गर्भ में ही उजाड़ दिया,
धरती की जिस कोख को तुमने बारूद और सीमेंट से फाड़ दिया,
क्या सचमुच तुम्हें हक है कि तुम पर मेघ मल्हार बरसे?
क्या हक है तुम्हें कि तुम्हारा आँगन खुशियों की बूंदों को तरसे?

-रविकान्त राऊत
 
3 महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all