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यादों का पेट्रोमेक्स

PAWAN THAKUR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            घर के एक कोने में पड़े दो-तीन पुराने पेट्रोमेक्स पर आज अचानक बच्चों की नज़र पड़ गई….
        
                                                    
                            
उन्होंने उत्सुकता से पूछा—
“पापा, ये क्या है? इसका उपयोग कहाँ होता था… और इसे कैसे जलाते थे?”

उनके इस मासूम सवाल ने जैसे यादों की पूरी गठरी खोल दी…

फिर क्या था— शुरू हो गई उस दौर की कहानी,
जब न हर घर में बिजली थी,
न एक स्विच दबाते ही उजाला हो जाता था…

जो बताया उन्हें— आप भी सुनें...

"यादों का पेट्रोमेक्स"
(पुरानी रोशनी, पुरानीयादों को नमन)

मिट्टी के तेल से भरा टैंक जब,
जीवन का आधार बनाता था,
गाँव-गाँव के हर अँधियारे में,
उम्मीदों का दीप जलाता था।

स्पिरिट की छोटी लौ जलाकर,
पहले मेंटल को तपाया जाता,
रेशमी जाली का उजला मन,
फिर चाँद सा जगमगाता।

प्रेशर पंप की मेहनत से जब,
हवा टैंक में भर जाती थी,
तेल ऊपर चढ़, रोशनी बन,
हर चौखट मुस्काती थी।

काँच की चिमनी की गोद में,
लौ सुरक्षित रह पाती थी,
आँधी-पानी चाहे जितना हो,
रात नहीं झुक पाती थी।

रबर वॉशर कसकर रखता,
हर दबाव को थामे रहता,
छोटी पिन भी नोजल साफ कर,
रोशनी का रस्ता कहता।

यही पेट्रोमेक्स कभी शादी-ब्याह की शान था,
गाँव की चौपाल की जान था,
मेला-ठेला की पहचान था,
और अँधेरी रातों का सबसे भरोसेमंद साथी था।

मिट्टी का तेल, स्पिरिट, मेंटल, प्रेशर पंप और काँच की चिमनी से सजा यह केवल एक लैंप नहीं था…
यह उस पीढ़ी की मेहनत, जुगाड़ और रोशनी की विरासत था।

बच्चे बड़े ध्यान से सुनते रहे…
और मैं सोचता रहा—
वक्त बदल गया, साधन बदल गए,
पर पुरानी चीजें सिर्फ सामान नहीं होतीं…
वे अपने भीतर पूरा इतिहास समेटे रहती हैं।

आज बिजली की चकाचौंध में,
भले पुराना सामान लगे,
पर मिट्टी का तेल, मेंटल, पंप—
सबमें बचपन की जान जगे।
Note: पुरानी रोशनी सिर्फ उजाला नहीं करती थी,
वो यादों, अपनापन और रिश्तों को भी जगमगाती थी…

 
58 मिनट पहले
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