विज्ञापन

ज़िन्दगी बीती इंतिज़ार में

Parul Bhaktani

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ये ज़िंदगी है बीती तेरे इंतिज़ार में
        
                                                    
                            
प्यासी रही है रूह मिरी एतिबार में

क्यों तोड़ दी है डोर मोहब्बत की तुमने ये
क्या मिल गया बता दे तू नफ़रत के वार में

जज़्बात समझे क्यूँ नहीं दिल के मेरे तू ने
ये ज़ेहन-ओ-क़ल्ब मेरे रहे डूबे प्यार में

तेरे विसाल के यकीं में जी रहे हैं हम
रहते हैं बेख़ुदी में तेरे ही ख़ुमार में

तुम बिन क़रार भी तो नहीं मिलता है हमें
रहता नहीं ये दिल भी मेरे इख़्तियार में
एक महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all