ज़र्द सा इक रंग होता है उदासी का
अर्थ होता है न बोली बद-हवासी का
चेहरे पर दिख जाता है हर दर्द-ओ-रंग आख़िर
तिश्ना सा दिल होता है इक रूह प्यासी का
ताज़गी होती है फूलों में मोहब्बत से
ज़र्द फूलों में है इक एहसास बासी का
वक़्त इतना भी बदल देगा न सोचा था
हो गया हर रिश्ता ही अब रू-शनासी का
कौन समझा है उदासी को शिकायत क्या
ध्यान रखना पड़ता ग़म की बे-लिबासी का