विज्ञापन

कैसा ज़माना आ गया

Parul Bhaktani

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            आज कैसा ये ज़माना आ गया
        
                                                    
                            
झूठ को अब सच बनाना आ गया

हाल अपना अब नहीं कह पाते हैं
दर्द हमको भी छुपाना आ गया

बाँट लेते थे कभी  ग़म माँ से हम
फिर हँसी में ग़म उड़ाना आ गया

भूल से ग़म-ख़्वार मिल जाए अगर
हाथ में जैसे ख़ज़ाना आ गया

काश लौटा पाता वो बचपन कोई
याद वो हँसना- हँसाना आ गया

पड़ दरारें हैं गई दीवार में
ख़्वाहिशों को अब घटाना आ गया
एक दिन पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Updesh Kumar

13466 कविताएं

View Profile

Dr fouzia

6957 कविताएं

View Profile

Dn Chaubey

7504 कविताएं

View Profile