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दरख़ास्त है

Parul Bhaktani

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            सर को झुका कर हम खड़े हैं अब तिरे दरबार में
        
                                                    
                            
दरख़ास्त है के दूर कर दे कमियों को किरदार में

अनजाने में हमसे कभी हो जाए भी गर भूल तो
बच्चे हैं हम तेरे खड़े हैं माफ़ी के आसार में

राहें भटकने से ही पहले राह हमको तू दिखा
आ जाए हमको जीना मुश्किल वक़्त की रफ्तार में

सुख-दुख में हम करते रहे तेरा ही शुकराना सदा
तेरी ही रहमत की हो बारिश भी दर-ओ-दीवार में

'पारुल' का सर तेरे ही सजदे में सदा झुकता रहे
तुमको ही देखूँ ज़िंदगी भर हर-सू मैं दीदार में
3 महीने पहले
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