विज्ञापन

“न जाने क्यों…”

Pari Nagar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            न जाने क्यों...... 
        
                                                    
                            
बस कभी-कभी चुप-सी हो जाती हूँ।
जहाँ अपना-सा नहीं लगता,
वहाँ से चुपचाप निकल जाती हूँ।

बैठ जाती हूँ अकेले,
थोड़ी मायूस होकर।

खुद से ही बातें कर जाती हुँ,
अपने ही ख्यालों में खोकर।

न जाने क्यों,
बस खुद में ही सिमट जाती हूँ,
भीड़ में भी अकेली-सी होकर,
खामोशी को अपना कर जाती हुँ।
- परी नागर
4 घंटे पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Ankit Kahar

5 कविताएं

View Profile

Prashant Sharma

2 कविताएं

View Profile

Anil Pandey

385 कविताएं

View Profile