न जाने क्यों......
बस कभी-कभी चुप-सी हो जाती हूँ।
जहाँ अपना-सा नहीं लगता,
वहाँ से चुपचाप निकल जाती हूँ।
बैठ जाती हूँ अकेले,
थोड़ी मायूस होकर।
खुद से ही बातें कर जाती हुँ,
अपने ही ख्यालों में खोकर।
न जाने क्यों,
बस खुद में ही सिमट जाती हूँ,
भीड़ में भी अकेली-सी होकर,
खामोशी को अपना कर जाती हुँ।
- परी नागर
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