देखना अक्सर सिर्फ़ सतह की एक तस्वीर लेता है,
समझना उस तस्वीर की तह में छुपी कहानी तक जाता है।
आँखें सब कुछ रिकॉर्ड कर सकती हैं,
पर जब तक मन और दिल
उस दृश्य के साथ कटघरे में खड़े न हों,
देखना केवल एक अंधा साक्ष्य बनकर रह जाता है।
सहूलियत का चश्मा उतार फेंकने का साहस नहीं,
इसलिए हम देखते हैं,
मुँह फेरते हैं, और आगे बढ़ जाते हैं।
जिस दिन सड़क पर छूट गए सन्नाटे को पढ़ना सीख लेंगे,
ख़ामोशी के पीछे छिपे ख़ौफ़ को पहचानेंगे
देखना सिर्फ़ एक भौतिक क्रिया नहीं रहेगा,
वह एक कटु ज़िम्मेदारी बन जाएगा।
क्योंकि देखना केवल तमाशबीन बनना नहीं है,
हर नज़रअंदाज़ किए गए दृश्य के पीछे
एक सवाल छूट जाता है -
वह सवाल, जो अब तुम्हारा है।
-अपराजिता परम