बचाना, अपने प्रश्नों को नदी की तरह,
जो चट्टानों से टकराती है...
पर किसी और की दिशा में बहना नहीं सीखती।
बचाना अपने आक्रोश को दीपक की लौ की तरह,
जो अँधेरा कम करती है, पर धुआँ नहीं बढ़ाती।
बचाना अपने कदमों को,
ताकि वे भीड़ की दिशा में नहीं,
अपने विवेक की दिशा में चलते रहें।
और सबसे अधिक...बचाना खुद को।
क्योंकि सबसे पहले, रास्ते नहीं बदलते,
प्रश्नों की दिशा, बदल दी जाती है।
-अपराजितापरम