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आखिरी पैगाम जाना के नाम

PARAM CREATIVE

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ये आखिरी पैगाम मेरा उस जाना के नाम,
        
                                                    
                            
लब पे मेरे आती रहती है जो सुबह-शाम ॥
दोस्तों, मिल जाए कहीं तो उसको ये बताना ।
आँसुओं में भीगा मेरा खत ये दिखाना ॥ १ ॥
जाना, ओ जाना, क्यूँ तुमको इतना माना ।
जान से ज्यादा चाहा, तुमको मेरी जाना ॥
वो कागज की नावें, रिमझिम में चलाना ।
तेरा संग पाने को, वो पढ़ने का बहाना ॥
छत पे चहलकदमी, वो पत्थर की गोटियाँ ।
बचपन में डूबी तेरी, वो चंचल शोखियाँ ॥
वो प्यारे से तोहफे, भीनी खुशबू प्यार की ।
ओ जाना ! कैसे भूलें बातें वो प्यार की ॥
यादों के झरोखों से मेरी जाना आती हैं ।
तेरी यादें ‘ओ जाना’ क्यूँ इतना रुलाती हैं ॥
जाना - - - - - - - - - - - - - - - - - - ॥१॥
होली की गुझिया, वो ईद की सेवइयाँ ।
दिवाली के दीये, पटाखे फुलझड़ियां ॥
दिल्ली की गलियाँ, वो सड़कों के किनारे ।
छोटी-छोटी बगियाँ, ऊँची-लम्बी मीनारें ॥
सौ-सौ जतन से जाना तुमको हँसाना ।
तेरे आँसुओं पे खून अपना बहाना ॥
मुमकिन नहीं जाना तुमको भुलाना ।
मेरी जान हो तुम, ओ मेरी जाना ॥
जाना - - - - - - - - - - - - - - - - - - ॥२॥
तेरी चाहत के नगमें, पलकें मोती पिरोए ।
कभी तो मिलेगी, सपने आस के सँजोए ॥
ना था पता उम्मीद, आके इस मोड़ छूटेगी।
तय है अब तो जाना साँसों की डोर टूटेगी ॥
खुश रहे तू सलामत, तेरी दुनिया रहे ।
न गम हो कभी दामन में तेरे खुशियाँ रहें ॥
जिस्म का नहीं रूह से है रिश्ता पुराना ॥
अलविदा, अलविदा, अलविदा ओ मेरी जाना ॥ ३ ॥
9 घंटे पहले
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