देखे तो थे बहुत सपने
चूल्हे में झोंक दिए
उनके चलते रिश्ते जलने लगे
ताप इतनी तेज थी कि
गर नहीं संभालती तो
सब खाक होने चला था
किसी एक को चुनना पड़ा
शायद वक्त का तकाजा रहा
सपने खुद ब खुद बुझने लगे
रिश्ते सब पनपने लगे
सोचती हूं
क्यों दोनों में तालमेल नहीं बैठा पाई??
क्या एक का जलना जरुरी था??
यहां आकर शायद शिकस्त खा गई
या शायद मैंने ही ये राह चुनी थी
सपनों से ज्यादा रिश्तों को अहमियत दी
पर रिश्तों के नीचे दबी सपनों की चिंगारी
आज भी बाकी है
बस इंतजार है सही वक्त सही दिशा का
-सरिता सिंह