समय भावनाओं के अधीन है
सफलता उसे उड़ना सिखा देती है
बिन पंख आसमां में उड़ता है
गम में तो जैसे ठहर जाता है
कछुए की चाल से आगे बढ़ता है
विपरीत काल में तो बस बेकाबू हो
न ही किसी की सुनता न ही मानता है
मंजर जब कुछ बुरा होता है
सहमा सा वो डर जाता है
भ्रमित हो राहें भटकता है
अब इंसान की भावनाओं से कुछ यूं बंधा है
संग उनके हंसता और रो लेता है
कभी दौड़ता और ठहर लेता है
अब समय के साथ चलना है
या अपने मन मुताबिक चलाना है
सब आप पर निर्भर करता है
-सरिता सिंह