जिस आंगन में खेल कूद बड़ी हुई
जहां बचपन से लड़कपन बीता
वो अब मुझ जैसे पराया हो गया
था कभी कितना अपना
अब बैगाना हो गया
सब तो वही है
फिर क्यों सब वैसा नहीं है
मेरे कमरे की दिवारे क्यों अपनी नहीं लग रही
क्यों मेरी अपनी अलमारी पराई हो गई
खाने में अब मां वाला स्वाद गुम गया
कोई और ही स्वाद आकर जुड़ गया
मेरी नन्हीं सी बगिया के फूल क्यों बदल गए
मेरे वो मोगरे के फूल कहां चले गए
सब बदला बदला सा क्यों लग रहा
भाभी के आने से मेरा मायका ही बदल गया
सब अपने ही तो है
फिर ऐसा क्या जो बदल गया
पुराना मायका शायद नया हो गया
वो भी मुझ जैसे पराया हो गया
-सरिता सिंह