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आज वो नदिया विशालकाय समंदर की हो चली थी

pankhuri singh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            पहुंच गई अपने अंतिम गंतव्य पर
        
                                                    
                            
जा मिली नदिया अथाह समंदर में
वो भी जैसे राह टोह रहा था
बाहें फैला समा लिया अपने विशाल मन में
ये कैसा अदभुत मिलन था
मीठे पानी का खारे में समागम था
चंचल अल्हड़ सी हुआ करती थी
पर आज एक अलग सा ठहराव था
जैसे जिस मंजिल की तलाश में थी
वो आज उसने आखिर पा ही ली थी
बहुत लम्बा सफर तय कर अनवरत बहकर
पहुंची थी अपने मनचाहे गंतव्य पर
आज वो चंचल सी नदिया परिपक्व हो चली थी
एक विशालकाय समंदर की हो चली थी

- सरिता सिंह
6 घंटे पहले
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