पहुंच गई अपने अंतिम गंतव्य पर
जा मिली नदिया अथाह समंदर में
वो भी जैसे राह टोह रहा था
बाहें फैला समा लिया अपने विशाल मन में
ये कैसा अदभुत मिलन था
मीठे पानी का खारे में समागम था
चंचल अल्हड़ सी हुआ करती थी
पर आज एक अलग सा ठहराव था
जैसे जिस मंजिल की तलाश में थी
वो आज उसने आखिर पा ही ली थी
बहुत लम्बा सफर तय कर अनवरत बहकर
पहुंची थी अपने मनचाहे गंतव्य पर
आज वो चंचल सी नदिया परिपक्व हो चली थी
एक विशालकाय समंदर की हो चली थी
- सरिता सिंह
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