आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

आज वो नदिया विशालकाय समंदर की हो चली थी

                
                                                         
                            पहुंच गई अपने अंतिम गंतव्य पर
                                                                 
                            
जा मिली नदिया अथाह समंदर में
वो भी जैसे राह टोह रहा था
बाहें फैला समा लिया अपने विशाल मन में
ये कैसा अदभुत मिलन था
मीठे पानी का खारे में समागम था
चंचल अल्हड़ सी हुआ करती थी
पर आज एक अलग सा ठहराव था
जैसे जिस मंजिल की तलाश में थी
वो आज उसने आखिर पा ही ली थी
बहुत लम्बा सफर तय कर अनवरत बहकर
पहुंची थी अपने मनचाहे गंतव्य पर
आज वो चंचल सी नदिया परिपक्व हो चली थी
एक विशालकाय समंदर की हो चली थी

- सरिता सिंह
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
55 मिनट पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर