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"उड़ान से पहले"

Pankaj Sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            उड़ानें जन्म लेती हैं पहले मन के निर्जन वन में,
        
                                                    
                            
जहाँ भय की जर्जर दीवारें वर्षों से खड़ी रहती हैं।
मनुष्य जब अपने ही संशयों से युद्ध जीत लेता है,
तभी दिशाएँ उसके चरणों में दीपशिखा-सी बहती हैं।

पंखों का अर्थ केवल नभ की सीमाएँ छू लेना नहीं,
यह तो भीतर सोई चेतना का जागरण होता है।
जो अपने मोहों की कारा से बाहर आ पाता है,
उसी के जीवन में अनन्त का प्रथम चरण होता है।

धरती हर क्षण बाँधना चाहती है आकर्षण देकर,
कभी संबंधों से, कभी यश के स्वर्णिम प्रलोभन से।
किन्तु जो आत्मा सत्य की अग्नि में तपना जान गई,
वह मुक्त हो उठती है समय और सारे बंधन से।

आकाश उन्हीं को अपना मौन रहस्य सुनाता है,
जो गिरकर भी पुनः शिखर की ओर बढ़ा करते हैं।
क्योंकि ऊँचाई का सौन्दर्य उन्हीं को उपलब्ध हुआ,
जो भीतर के अंधकारों से प्रतिदिन लड़ा करते हैं।

उड़ना केवल गति नहीं, एक तपस्वी-सी साधना है,
जिसमें मन को स्वयं अपने विरुद्ध खड़ा होना पड़ता।
अहंकारों की अंतिम परछाईं जब विलीन हो जाए,
तब जीवन को अपनी असली दिशा मिलना पड़ता।

अंततः हर उड़ान वहीं से आरम्भ हुआ करती है,
जहाँ मनुष्य स्वयं को सीमाओं से परे देख सके।
जिस दिन वह अपने भीतर के नभ को पहचान गया,
उस दिन बिना पंखों के भी अनन्त गगन लेख सके।
एक महीने पहले
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