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"शेष बचे हस्ताक्षर"

Pankaj Sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कुछ संबंध
        
                                                    
                            
अब घरों की दीवारों पर टंगे
पीले पड़ते कैलेंडरों जैसे हैं—
जिन्हें कोई बदलता नहीं,
बस तारीख़ें उतरती रहती हैं
और भीतर का समय
धीरे-धीरे मरता रहता है।

अब लोग
एक-दूसरे को नहीं पढ़ते,
केवल नाम याद रखते हैं।
स्पर्श की ऊष्मा
काग़ज़ों की तहों में दब गई है,
और आत्मीयता
सरकारी मुहरों की स्याही में
अपना अंतिम अर्थ खोज रही है।

कभी एक आहट से
खुल जाते थे मन के द्वार,
अब वर्षों साथ चलने पर भी
कोई किसी तक नहीं पहुँचता।
भीतर इतने बंद कक्ष हैं
कि आवाज़ लौट आती है
अपने ही अकेलेपन से टकराकर।

सभ्यता ने
हमें संवाद की असंख्य भाषाएँ दीं,
पर एक सरल संबोधन छीन लिया।
अब संबंध निभाए नहीं जाते—
सिर्फ प्रमाणित किए जाते हैं।
मानो प्रेम भी
किसी कार्यालय की फाइल हो
जिस पर हस्ताक्षर आवश्यक हों।

और इस समूचे उजाले में
मनुष्य अधिक अंधकारमय हो गया है।
भीड़ के बीच खड़े लोग
अपनी-अपनी निस्तब्धताओं में निर्वासित हैं।
कुछ रिश्ते सचमुच खो चुके हैं,
और कुछ
प्रतिदिन थोड़ा-थोड़ा टूटते हुए
अभी भी जीवित होने का अभिनय कर रहे।
एक महीने पहले
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