विज्ञापन

या देखने वाला कभी "मैं" था ही नहीं?

Pankaj Sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            समेटता रहा—
        
                                                    
                            
घर नहीं,
अपना बिखराव।
लौटता रहा—
स्वयं तक,
स्वयं बिना।

कुछ स्वप्न
स्मृति न बने।
कुछ प्रतीक्षाएँ
काल न बनीं।
दोनों ही
मौन रहीं।

कुछ संबंध
टूटे नहीं।
नाम बिखरे,
अर्थ बचे।
आज भी वे
शब्दातीत हैं।

समय गुज़रा।
घटनाएँ गुज़रीं।
घाव नहीं।
केवल उनकी
भाषा बदलती रही।

जो बचा,
क्या वही मैं?
जो खो गया,
क्या वही था?
या दोनों ही
मेरा भ्रम थे?

रिक्त हुआ—
तो जाना,
मौन हुआ—
अब शेष
केवल प्रश्न है—
जो "मैं" कहता है,
क्या वही देखता है;
या देखने वाला कभी "मैं" था ही नहीं?
2 सप्ताह पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Manju Sharma

3565 कविताएं

View Profile