तुम आदि-अंत की अमर कथा,
मृत्तिका! सृजन की अमिट व्यथा।
धूलि मत समझो इस काया को,
यह समेटे है महामाया को।
जब बरसे सावन की बूँदें,
कण-कण अपनी आँखें मूँदे।
सौंधी सुगंध तब जगती है,
मृत्तिका आदि-ऋचा लगती है।
तुम चाक पर हँसकर घूम रही,
निर्मम आघातों को चूम रही।
सहकर पीड़ा आकार लिया,
मृत्तिका ने घट बन उपकार किया।
तुम अन्नदायिनी, जीवन हो,
मृत्तिका! मयी पावन मन हो।
कितने ही वैभव आए-गए,
सब तेरी गोदी में सोए।
छाती को चीर उगा अंकुर,
मृत्तिका से पाया जीवन-सुर।
पाषाण यहाँ पूजे जाते,
पर आधार तुम्ही से हैं पाते।
मानव करता मिथ्या अभिमान,
भूल गया माटी का वरदान।
पर अंत समय जब आएगा,
मृत्तिका में सब मिल जाएगा।
पद-दलित थपेड़े सहती हो,
पर शांत, मौन तुम रहती हो।
झुककर ही सृजन सिखाती हो,
मृत्तिका! चंदन बन जाती हो।
तुम आदि-अनादि महादर्शन,
आत्मा का अंतिम तुम तर्पण।
मृत्तिका में ही विश्राम मिला,
नश्वर जीवन को धाम मिला।