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"मनोवृत्ति का दीप"

Pankaj Sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मन में उठते स्वप्न अनेक,
        
                                                    
                            
ज्यों नभ में तारक-असंख्य।
पर दिशा बिना वे भटकें,
रह जाए जीवन अलक्ष्य॥

मन तो केवल स्रोत-विचार,
निर्झर-सा नित बहता है।
मनोवृत्ति का दृढ़ तट ही,
उसको पथ पर रखता है॥

ज्ञान-विभव यदि हो अपार,
पर दृष्टि रहे संकीर्ण।
तब प्रतिभा का सूर्य भी,
हो जाता निस्तेज, क्षीण॥

जो अंतर को साध सके,
मन और दृष्टि के बीच।
उसके पग चूमे उत्कर्ष,
सफलता आए समीप॥

अवसर को पहचान सके,
ऐसी हो अंतर्दृष्टि।
विचारों को कर्म बनाती,
यही प्रखर मनोवृत्ति॥

प्रगति न बाह्य उपलब्धि,
न केवल यश का मान।
मन-मनोभूमि के साम्य का,
वह है उज्ज्वल अभियान॥
एक महीने पहले
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