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"बचपन के पार""

Pankaj Sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            किसने रख दी हैं
        
                                                    
                            
गुड़ियों की हथेलियों में
तालियों की भूख,

और किसने सिखा दिया है
कच्ची उम्र को
दृष्टियों का अर्थ?

अभी तो उन्हें
मिट्टी से सपने गढ़ने थे,

पर उनके चारों ओर
बाज़ार ने
दर्पणों का वन उगा दिया है।

जहाँ बचपन था,

वहाँ अब
प्रदर्शन की चकाचौंध है,

और मासूम हँसी के ऊपर
किसी अदृश्य महत्वाकांक्षा का
आवरण पड़ा है।

वे नहीं जानतीं अभी—

प्रशंसा की ध्वनि
कितनी क्षणभंगुर होती है,

पर बड़े लोग
उन्हें सिखा रहे हैं

कि स्वीकृति ही
जीवन का सबसे बड़ा पुरस्कार है।

घरों के आँगन में

जब चरित्र से पहले
प्रसिद्धि का पाठ पढ़ाया जाता है,

तब संस्कारों के बीज
धीरे-धीरे सूखने लगते हैं,

और चेतना की मिट्टी में
प्रतिस्पर्धा उग आती है।

बच्चा वही बनता है
जिसे वह प्रतिदिन देखता है;

यदि उसकी आँखों में
बार-बार बाहरी चमक भरी जाए,

तो भीतर का दीपक
जलना भूल जाता है।

दोष केवल अँधेरे का नहीं,

प्रकाश की दिशा का भी होता है।

क्योंकि रक्षक ही
यदि राह बदल दें,

तो मासूम पग
किस ओर जाएँ?

मैं सोचता हूँ—

क्या हर कली को
फूल बनने की उतनी मोहलत मिलेगी,

जितनी प्रकृति ने
उसके लिए निर्धारित की थी?

या हम
समय से पहले ही

उसकी पंखुड़ियों को खोलकर
उसे वसंत का नाम दे देंगे?

याद रखो,

जिस समाज में
बचपन को बचपन रहने का अधिकार नहीं मिलता,

वहाँ बड़े होकर लोग
सत्य नहीं जीते,

वे केवल
दूसरों की अपेक्षाओं के पात्र बन जाते हैं।

और तब
भविष्य का निर्माण नहीं होता,
केवल एक ऐसा बाज़ार बनता है
जहाँ मासूमियत की कीमत तो होती है,
पर उसका मूल्य
किसी को ज्ञात नहीं रहता।
एक दिन पहले
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