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कुर्सी का है सारा किस्सा

Pandit Chandradutt

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ये कुर्सी ना तुम्हारी है ना हमारी,
        
                                                    
                            
जनता की है यह जिम्मेदारी,
किसको सौंपें किसको ना सौंपे ?
फैसला करना बड़ा भारी।
जब चाहे उतार दे, जब चाहे बैठा दे,
जनता की आवाज ईश्वर की आवाज,
बड़े से बड़े नेता आए और गए,
सदैव जनता ने ही बाजी मारी।
बस कुर्सी का ही है सारा किस्सा,
जोड़ तोड़ कर करके,
करते रहते हैं तैयारी।
-चंद्र दत्त शर्मा
एक महीने पहले
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