कैसे मानू मैं...? सावन आया,
रिमझिम रिमझिम बरसात हुई,
कावड़ियों के तो शोर सुने,
हर जगह भोले की बम गूंजी,
इसके बाद तीज त्यौहार पर,
घर चौपालों पर झूला नहीं,
मां बहनों के गीत नहीं,
तिजों पर कोई खेल खिलावन नहीं,
सूना सूना त्यौहार लगे,
सुबह को छोड़, शाम को त्यौहार मने,
अब कोई रौनक नहीं,
अब कैसा वक्त आ गया?
त्यौहार त्यौहार लगता नहीं।
-चंद्र दत्त शर्मा