जख्म भरे नहीं दिल के,
मरहम लगाने आ गए।
दर्द दे दिया क्यूँ इतना ?
पूरी खुशियां खा गए।
नहीं निभाया अपना पन,
पराए से भी बदतर हो गए।
कैसे समझूं तुम्हें अपना ?
कसूरवार तो हम हो गए।
पलटकर भी नहीं देखा,
क्यों गुमनाम से हो गए ?
ये रीत की प्रीत कैसी ?
वादे सब झूठे हो गए।
-चंद्र दत्त शर्मा