हम बहारों को ढूंढते थे कभी,
आज बहारें हमको ढूंढती हैं।
सुनहरे दिन लापता हो गए,
हवा बादल से पता पूछती हैं,
जहां जाते वहीं दीखते थे नजारे,
कब लौटेंगे बस यही सूझती है?
-चंद्र दत्त शर्मा