फूल भी मुझे शूल लगने लगे,
तेरे विरह का रस पिलाने लगे।
फूल को हाथ से मसल देता हूं,
कुछ तो दिल को तसल्ली लगे।
पर सुकून कहां इस विरह में ?
इधर से उधर मन घूमने लगे।
यदि जाता हूं कहीं दूर भी मैं ?
तो मन में मेरे बेचैनी बढ़ने लगे।
-चंद्र दत्त शर्मा