मेरे क़लम को इख़्तियार सिर्फ़ ख़्वाबों पर है,
हक़ीक़त पर नहीं,
मेरी दास्तान-ए-दर्द गवाह है,
मुझे अब चाहत पर ऐतबार नहीं।
एक गुमनाम गुज़ारिश तो है दिल में
कि तुम लौट आओ
मगर अब इस ज़िंदगी में
मज़ीद तल्ख़ी की गुंजाइश नहीं।