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ख़्वाबों का इख़्तियार

Palak Sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मेरे क़लम को इख़्तियार सिर्फ़ ख़्वाबों पर है,
        
                                                    
                            
हक़ीक़त पर नहीं,

मेरी दास्तान-ए-दर्द गवाह है,
मुझे अब चाहत पर ऐतबार नहीं।

एक गुमनाम गुज़ारिश तो है दिल में
कि तुम लौट आओ

मगर अब इस ज़िंदगी में
मज़ीद तल्ख़ी की गुंजाइश नहीं।
एक महीने पहले
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