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समर्पण

Padmavathi Pandyaram

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हे गोविंद  बोल..क्या यह है रुक्मिणी की चाल?
        
                                                    
                            
मैं तो पूजूं पारिजात,कहाँ से आई तुलसी गोपाल?
वक्र स्मित पर त्रिभंगी चाल, हंसकर बोले मदन गोपाल,
वैकुण्ठ लोक की अपर स्वामिनी .तनिक वसुधा पर दृष्टि डाल
बैठी मीरा बृंदा उपवन , देह प्राण पर तुलसी डाल , 
तुलसी तरंग श्वास स्पंदन , तुलसी शोभे उज्जवल भाल ।
लाल में अपना तन मन रमाए , लाल रंग में भई थी लाल ।  
उस लाली का राग लालित्य , सत्या भी हो गई निहाल ।
स्तंभित भई स्वर्गस्वामिनी, देख उन्मादी भक्ति उबाल ।
गोविंद नयन बंधित अश्रु ,आतुर स्खलन को हाल बेहाल ।
भामा मन व्याकुल संशंकित , न जाने होगा ,आगे क्या हाल ?
हुआ वही ,जिसका था भय, गिरा अश्रु भिगो के गाल ,
धरा बरसे मेघ ‘घनश्याम’, अभिषिक्त मीरा  तरंग ताल,
आज प्रभु ने किया अभिषेक , हुई भक्ति मालामाल ॥
-डॉ पद्मावती

 
 
2 वर्ष पहले
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