सत्य, संयम, कर्तव्य, नि:स्वार्थ कर्म
ये सब कहलाते पुरुषार्थ
पुरुषार्थ यदि प्रबल है तो मानव
जीवन बन जाता है निर्माता
पुरुषार्थी चरित्र कर्मों पे बल देकर
परिस्थिति का दास नहीं बनता
प्रकृति से सीखो हे मानव
नि:स्वार्थ भाव से कर्म करना
ज्यों सूर्य निरंतर प्रकाश देता
वृक्ष सदा देते फल और छाया
सम भाव से जो भी चाहता
नदियां निरंतर बहती कल कल
जल रूपी अमृत दिया करतीं
अन्न, वस्त्र, आश्रय देकर जैसे
धरती सबको पोषित करती
महापुरुष भी बिना बखान किये
समाज को सही दिशा देते रहते
वे सेवा में आनंदित होकर
बिना अभिमान रहा करते
दैनिक जीवन में भी पुरुषार्थ
मानव तुम कर सकते हो
क्रोध त्याग क्षमा, स्वत त्याग सेवा
प्रतिशोध के स्थान करुणा करके
निराशा के बदले आशा दे सकते हो
समाज में वो ही सम्मानित होते
जो सदाचार का पालन करते
अंतःकरण निर्मल हो तो
जीवन प्रेरणा बन जाता है
ऐसा मानव इस दुनिया में
आध्यात्मिक ऊंचाई पा जाता है