नदी की एक धारा थी
बह रही अनवरत थी
रास्ते में दूसरी धारा मिली
दोनों बातें करती अग्रसर थीं
पहली बोली देखो सखी
आम की सघन कुंजे
मन को मोह रहीं
ठंडी ठंडी बयार आनंदित कर रही
अब तो मैं यहां विश्राम करूंगी
चलते चलते बोझिल हो गई हूं
ऐसा जीवन भी किसी काम का नहीं
जहां एक पल चैन न हो
और वह रुक गई
पेड़ की सघन छाया में
जल एकत्रित होने लगा
दूसरी धारा आगे बढ़ गई
जाते जाते पहली से बाेली
निरंतरता ही जीवन है
जल की पवित्रता ही बहने में है
यदि तुम रुक गई तो अपना स्वाभाविक गुण खो दोगी
धीरे धीरे उसने एक सरोवर का रूप ले लिया
रुके जल में काई की मोटी परत जम गई
जल दूषित हो दुर्गंध देने लगा
गांव वाले भी अब उसका जल प्रयोग नहीं करते
इस लिए चलते रहो चलते रहो
जीवन में सदैव कार्य कर आगे जो बढ़ता है
वही सफलता की सीढ़ी चढ़ता है