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नदी की सीख

P R Yadav

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            नदी की एक धारा थी
        
                                                    
                            
बह रही अनवरत थी
रास्ते में दूसरी धारा मिली
दोनों बातें करती अग्रसर थीं

पहली बोली देखो सखी
आम की सघन कुंजे
मन को मोह रहीं
ठंडी ठंडी बयार आनंदित कर रही
अब तो मैं यहां विश्राम करूंगी
चलते चलते बोझिल हो गई हूं
ऐसा जीवन भी किसी काम का नहीं
जहां एक पल चैन न हो
और वह रुक गई
पेड़ की सघन छाया में
जल एकत्रित होने लगा
दूसरी धारा आगे बढ़ गई
जाते जाते पहली से बाेली
निरंतरता ही जीवन है
जल की पवित्रता ही बहने में है
यदि तुम रुक गई तो अपना स्वाभाविक गुण खो दोगी

धीरे धीरे उसने एक सरोवर का रूप ले लिया
रुके जल में काई की मोटी परत जम गई
जल दूषित हो दुर्गंध देने लगा
गांव वाले भी अब उसका जल प्रयोग नहीं करते
इस लिए चलते रहो चलते रहो
जीवन में सदैव कार्य कर आगे जो बढ़ता है
वही सफलता की सीढ़ी चढ़ता है
2 महीने पहले
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Manju Sharma

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