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डिलीवरी बॉय

P R Yadav

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            डिलीवरी बॉय के जीवन में कुछ ऐसे क्षण आते
        
                                                    
                            
जो कभी न भूलनेवाली यादों में अंकित हो जाते
ऐसा ही एक आखिरी ऑर्डर था
पता पुराने शहर की पुरानी बिल्डिंग का था
पैकेट बहुत हल्का था
खिचड़ी के संग दही और फल था
बिना समय गंवाए पहुंच गया
डोर बेल बजाई, दरवाजा खुला
कांपते हाथ, आंखों पे मोटा चश्मा,
बाल चांदी से चमकते, स्वर मधुर था

बोली इशारा करके इसे वहां रख दें
जैसे ही जाने को हुआ, वो बुजुर्ग महिला बोली,
बेटा क्या तुम 2मिनट बैठ सकते, यहाँ
कई दिन से आवाज नहीं सुनी किसी की,
कमरे में सन्नाटा था सिवाय घड़ी की टिक टिक के
दीवार पर कुछ पुरानी तस्वीरें,
एक भगवान की फोटो भी थी
खिचड़ी खाते महिला ने परिचय कराया
ये पति हैं मेरे ये बेटा, बेटी भी है
महिला ने खा कर हाथ धोयें
पर्स से पांच सो का नोट निकाला
थमाते बोली ये तुम्हारी टिप नहीं है
ये तो उस समय की है जो तुमने मेरे साथ बिताया
सुने मन में आशा के दीप जलाए

नहीं अम्मा ये रखो काम आए
अम्मा ने प्रश्न किया
क्या तुम्हारी माँ है?
उसे रोज फोन करते हो

नहीं कभी कभी जब टाइम मिलता
अभी बात कर लेना जाकर
बिल्डिंग से नीचे उतरा
गाड़ी का हैंडल पकड़ फोन लगाया
उधर से आवाज आई
घबराई सी, क्या हुआ बेटा
इतनी रात सब ठीक तो है न
आँखों में आंसू भरे हां कहा
खाना खाया तुमने
हां मां, झूठ कह दिया

रास्ते भर सोचता रहा
ये दुनिया भी कितनी बदल गई अब
किसी को दवा चाहिए
किसी की सकूँ के दो शब्द
किसी को खाने की आस
तो किसी को अकेले पं से निजात
बस यही है जिंदगी की कश्मकश
यही है जीवन की भागदौड़
3 महीने पहले
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