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और लफ़्ज़ फिर से कोने में व्याकुल ठहर गए

Osita Bharti

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कमरे के कोने में एक किताब पड़ी थी
        
                                                    
                            
खुली हुई, पृष्ठ पुराना ज़र्द हो रखा था
खुली हुई, पर पढ़ी नहीं जाती
शब्द थे, स्याही थी, हर पन्ने पर एक बोझ था
मानो क़लम ने भरसक प्रयास से कलाकारी की हो
समय की धूप में जला, वो म्लान पन्ना था
जिस पर लिखी यादें भी अब पढ़ी नहीं जातीं…
वक़्त ने इस पर निशान छोड़ दिए,
मगर किसी ने इसे पढ़ने की ज़िद नहीं की
रोशनी आती, कुछ पल ठहर निहारती, रूठ कर चली जाती
भीड़ ठहरती, शीर्षक देखती और मुँह फेर लेती
महफ़िल गुज़रती रही, अपनी कहानियाँ रच कर चली जाती
हवा के साथ, रोज़ सफ़हा पलटता रहा
पर कहानियाँ उस किताब में ही सहम कर रह गईं
वक़्त ने धीरे-धीरे इस पर धूल जमा दी
और लफ़्ज़ फिर से कोने में व्याकुल ठहर गए

 
एक महीने पहले
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