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ये लोग कौन है

Omprakash Agarwalla

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            उन्माद नहीं, नारे भी नहीं,
        
                                                    
                            
चल रहे ये सब मौन है.
‘भारत के हम लोगों’ में,
आखिर ‘ये लोग’ कौन है?

सर पे गठरी, हाथ में नौनिहाल है
तपती सड़क पर हर एक बेहाल है
श्वेद, अश्रु और रक्त से तरबतर
हर एक शख्स बदहाल है.

रोटी के आश्वासनों से बच्चों को छल रहे हैं
पेट की आग में सारे सपने जला रहे हैं
भूख को दर्द से और दर्द को भूख से
सुबह, दोपहर और शाम बहला रहे हैं.

बच्चे, बूढ़े सह ये लाखों पांव
जा रहे है आज अपने गाँव.
थकान, दर्द, धुप से निर्विकार
चल रहे है ये सब लगातार

नीली भी नहीं सफ़ेद भी नहीं है
इनके बनियान पर कोई कालर नहीं है.
राजनीति है हावी, कहीं इंसानियत नहीं है,
ये यात्रा दंड है, कोई दांडी नहीं है.

चलते चलते कोई रास्ते में मर गया
चलते चलते कुछ को काल मार गया
कोई पोटली में राख लिए जा रहा है
कोई बच्चे की लाश लादे जा रहा है.

कोई तो अधिकार होगा इनका
कोई तो कानून होगा इनके लिए
माना ये किसी चैनल के मालिक नहीं
पर कोई तो अदालत होगी इनके भी लिए.

इनके यहाँ भी तो मजमा लगा था
इनके दरों पर भी तो आये थे वों
इनके नाखूनों पर भी तो स्याही लगी थी
कुछ दिनों पहले जब सरकार बनी थी.

इनके पदचापों में सुनो
इनके मौन से समझों
नए भारत का पहला पन्ना
अश्रु, श्वेद और रक्त से लिखा जा रहा है.

संविधान का कोई तो पन्ना होगा
जो इनकी बात करता होगा
हम भारत के लोग में
कुछ लोग तो ये भी होंगे.

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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6 वर्ष पहले
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