तुम रुकना मत, बढ़ते चल,
जीवन-संघर्ष के इस मंथन से,
अमृत के रस गढ़ते चल,
तुम रुकना मत, बढ़ते चल॥
अगर मार्ग में समंदर आ जाए,
लहरों से तुम डरना नहीं,
लहर भय के इस भ्रम में,
मंज़िल से मुड़ना नहीं॥
भंवर में गर फँसी हो कश्ती तेरी,
तुम खुद अपनी राहों का माझी बन जाना,
हिम्मत और हौसलों के जुनून से,
तुम स्वयं अपना पतवार चलाना॥
असफलता के क्रंदन से आहत होकर,
तुम पलकों से नीर बहाना मत,
जब तक सफलता हाथ न लगे,
कोशिश की दीप बुझाना मत॥
चमक सको न सूरज जैसा,
दीपक बनकर जलना तुम,
जलना और जलाते रहना,
जग को प्रकाशित करते रहना॥
रुकना तो कायरता है,
आत्मबल की दुर्बलता है,
तुम मंज़िल के मुसाफ़िर हो,
तुम रुकना मत, बढ़ते चल,
जीवन-संघर्ष के इस मंथन से,
अमृत के रस गढ़ते चल,
तुम रुकना मत, बढ़ते चल॥
-नूतन झा!