शीर्षक : कुंती–कर्ण संवाद
खेला करती थीं,
बचपन जहाँ रंगरेलियाँ,
आज उसी मिट्टी पर
बह रही थीं खून की होली।
कुरुक्षेत्र की रणभूमि में
चारों ओर सन्नाटा था।
स्तब्ध, मौन, गंभीर खड़ी,
दिख रहा सिर्फ़ एक साया था।
एक तो बाहर का अंधकार
कर रहा था हर पल शोर,
ऊपर से भीतर की चिनगारी
न जाने ले जा रही थी किस ओर।
मुख मलिन, नज़र झुकी-सी,
कोई और नहीं, वही कुंती नारी थी।
लाचार, विवश, अपने ही निर्णयों से घायल,
एक अभागी कोमल सुकुमारी थी।
हर पल सता रही थी
उसे सिर्फ़ एक व्यथा।
कैसे सुनाऊँ कर्ण को
अपनी अतीत कथा।
छिड़ेंगे कल जब
महाभारत का घोर युद्ध,
मेरे ही दो लाल
लड़ेंगे एक-दूसरे के विरुद्ध।
अब और सहा जाता नहीं,
चुपचाप मौन रहा जाता नहीं।
मैं लोक-लाज सब छोड़ दूँगी,
दुनिया के समक्ष सत्य बोल दूँगी।
मन ही मन हिम्मत जुटाकर
गई कुंती जाह्नवी तट पर।
देखा जब कर्ण का तेजस्वी रूप,
उमड़ने लगी ममता की अविरल धूप।
कर्ण—
सूर्य को अर्घ्य देकर
जब निकला था कर्ण नदी के बाहर,
देख चकित हो उठा
समक्ष कुंती को पाकर।
कहिए देवी!
किस प्रयोजन से यहाँ आई हैं?
इस राधेय के निमित्त
आदेश क्या लाई हैं?
कुंती—
विगलित होकर कुंती बोली—
आदेश नहीं, विनीत प्रार्थना लेकर आई हूँ।
वर्षों से उलझी थी जो राज,
उसे आज सुलझाने आई हूँ।
राधा-सूत नंदन नहीं,
तू अंगज है मेरा।
पिता तेरा अधिरथ नहीं,
स्वयं सूर्यदेव हैं तात तुम्हारा।
अनाथ नहीं तुम इस दुनिया में,
पाण्डवों के अग्रज हो।
युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन के समान
तुम भी उन्हीं कुल के वंशज हो।
क्या उचित लगता है तुम्हें
अपने ही भाइयों संग लड़ना?
जब तुम जान चुके हो,
ये सभी तुम्हारे ही अपने हैं।
अब भी समय है,
लौट आओ अपने अनुजों के पास।
छोड़कर अधर्म का रास्ता,
मिला लो पाण्डवों संग हाथ।
कर्ण—
ममता का झूठा मुखौटा पहनकर
क्या दर्शाने आई है?
भूल चुका था जिस अतीत को,
उस पर क्यों मरहम लगाने आई है?
धिक्कार है मुझे
आपकी ममत्व पर।
छोड़ आई जो अपने कोख को,
किसी दूसरे के हक़ पर।
असमय पाकर मुझे
माना कि मजबूर थी।
भरी सभा में जब सूतपुत्र कह बुलाया अर्जुन ने,
उस समय भी आप मेरी व्यथा से दूर थीं।
ऐसा नहीं माता,
कर्ण! आपके लिए कभी विह्वल नहीं...
याद करके आपको कल्पना में,
मेरा दिल दहलता रहा।
जीवन भर यह रिक्तता
मुझको रुलाती रही।
अपमान और तिरस्कार का घूँट
सदैव पिलाती रही।
मेरा दामन छोड़ आप
महलों की शान बढ़ाती रहीं।
मातृ-पुत्र और अपने पुत्र के बीच
आँचल ममता का बिछाती रहीं।
धन्य है वह देवी राधेय,
जिसने मुझे ममता का स्नेह दिया।
अपना दूध नहीं, रक्त से सींचकर
इस नश्वर जीवन में प्रेम दिया।
कुंती—
पलभर के लिए उतार दो ये
कड़वाहट का कवच।
मन से मिटा दो यह द्वेष का ज़हर।
बस एक बार गले लगाने दो,
वात्सल्य अपना लुटाने दो।
माता नहीं, कुमाता हूँ मैं।
तेरे दुःखों की दाता हूँ मैं।
पर मेरी भी कुछ विवशता थी,
कहीं मलिन न हो जाऊँ समाज में,
इसकी मुझको चिंता थी।
मेरी सेवा का फल हो तुम,
ऋषि दुर्वासा का वर हो तुम।
मिला था मुझे उनसे वरदान—
इच्छित देव के आह्वान पर
आएँगे स्वयं भगवान।
बाल-अबोध-सा मन ये मेरा,
कर बैठी यह भूल ज़रा।
मंत्र की सत्यता परखने हेतु
सूर्यदेव को किया प्रणाम,
जिनसे मिला ममता का यह अनमोल इनाम।
पर सामाजिक लांछन से डर गई थी मैं,
लोक-लाज से मर गई थी मैं।
सूझ रहा था न कोई विकल्प,
दिख रहा था सिर्फ़ एक संकल्प।
दे आई तुम्हें गंगा की धारा में,
छोड़ आई ममता को
वहीं उसी किनारे में।
पर देखो, पुत्र! समाज से अब
मैं कहने आई हूँ।
परनिंदा, परिहास झेलकर
अधिकार तुम्हारा देने आई हूँ।
बहुत विलंब कर दिया, माता,
मेरा अतीत बताने में।
अब शेष कुछ बचा नहीं,
शिवाय अपने फैसले पर पछताने के।
दुर्योधन का ऋणी हूँ मैं,
जिसका कर्ज़ चुकाना है।
देकर युद्ध में प्राणों की आहुति,
मित्र का धर्म निभाना है।
लेकिन दानवीर कर्ण हूँ मैं,
निराशा नहीं जाने दूँगा।
पाँच पुत्रों की माता हैं आप,
जिस पर आँच नहीं आने दूँगा।
इस निर्णायक युद्ध में
कुछ तो आपको देना होगा।
कर्ण बचे या अर्जुन,
किसी पर तो रोना होगा।
— नूतन झा