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ख्वाब और हकीकत

nutan Kumari

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ख्वाब, कल्पना के एक इंद्रधनुषी सपने हैं,
        
                                                    
                            
जबकि इसका टूटना हकीकत की एक पहचान है।

ख्वाब सजाए थे आसमान की बुलंदियों को छूने के,
हकीकत देखी है नसीब पर होने की।

तकदीर ने ऐसे रुखसत किया
कि खामोश होकर रह गई,
दिल तो छूना चाहा आसमान की बुलंदियों को,
मगर पैर मजबूरियों की जंजीर में बँध गए।

दर्द की दीवानगी ने ऐसी कसक ढाई है
कि आँसुओं की मेहरबानी भी हमसे दूर भागी है।

जब अपनों ने दर्द दिया
तो आँसू बहाना छोड़ दिया,
दिल तड़प-तड़प कर रह गया,
आशियाना बनाना छोड़ दिया।

हालात कुछ ऐसे हुए
कि सपनों को छोड़ना पड़ा,
फ़र्ज़ की तराजू पर
ज़िंदगी को तौलना पड़ा।

सुख-दुख के इन पलड़ों पर
दुख की ही तौल प्रखर रही,
मुस्कान के प्रतिक्षण आलिंगन से भी
धर्मकाँटा में न समरसता रही।
— मुनुचंदा
एक घंटा पहले
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